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महाभारत के शक्तिशाली योद्धाओं का जीवन परिचय।



 
महाभारत का युद्ध विश्व का सबसे विशाल युद्ध लड़ा गया था। महाभारत का युद्ध कोरव और पांडवो के  बीच  लड़ा गया। महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र (एक शहर हैं जो हरियाणा में हैं।) में हुआ था। महाभारत के युद्ध में बहुत से शक्तिशाली योद्धाओं ने अपने प्राणों की आहूति दी। महाभारत का युद्ध 18 अक्षोणी सेनाओं के बीच हुआ तथा 11 अक्षोणि सेना कोरवो की ओर से तथा 7 अक्सोणी सेना पांडवो की ओर से लड़ी। भारत युद्ध से हमे बहुत से शक्तिशाली योद्धाओं के बारे में पता चलता हैं।

महाभारत के कुछ शक्तिशाली योद्धाओं का जीवन परिचय तथा उनकी उम्र के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे -

 #1 श्री कृष्णा ( Shri karashna)


श्री कृष्णा 

श्री कृष्णा (shri karishna). श्री कृष्णा जी का जन्म मथुरा राज्य में ( राजा कंश के एक कारगर में ) भाद्र पद में कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था। तथा इनका पालन पोषण व्रदावन में हुआ। इनकी माता का नाम देवकी था। और वासुदेव के पुत्र थे, लेकिन लालन पालन माता यशोदा,नंद बाबा के यहां हुआ था। इनके भाई का नाम बलराम था। और बहन का नाम सुभद्रा। इन्होंने 16 वर्ष की आयु में अपने मामा को  युद्ध में परास्त किया।महाभारत युद्ध में श्री कृष्ण जी ने पांडवों का साथ दिया। जब महाभरत का युद्ध हुआ तो कृष्णा जी की आयु 85 वर्ष थी।( मत्स्य  पुराणों में बताया गया हैं की श्री कृष्ण जी की आयु 125 वर्ष थी, जब उन्होंने शरीर का त्याग किया)। 


  2# Arjun ( अर्जुन)


अर्जुन

अर्जुन (Arjun) अर्जुन की माता का नाम कुंती और पिता का नाम पांडू था। परंतु इनके वास्तविक पिता इंद्रदेव थे।( चुकी इनकी माता को महर्षि दुर्वासा जी ने वरदान के रूप में 5 मंत्र दिए थे, और बोले जब भी तुम जिस देवता को ध्यान में रखकर , मंत्र का जाप करोगी उसके समान तुम्हे पुत्र की प्राप्ति होगी)। ये जन्म से ही धनुर्विद्या मे बहुत निपुण थे। कहा जाता हैं की इनके जैसा संपूर्ण विश्व में धनुर्धारी नही हुआ। इनके गुरु जी का नाम द्रोणाचार्य था, तथा इनका पत्नी का नाम सुभद्रा था। और इनके पुत्र का नाम अभिमन्यु था। मत्स्य पुराण के अनुसार श्री कृष्ण और अर्जून की आयु समान थी। महाभारत के युद्ध में अर्जुन पांडव सेना के प्रमुख योद्धा थे। इन्होंने युद्ध में सबसे जायदा संहार किया था। अर्जुन अपने दोनो हाथो से समान बाण चलते थे। अर्जुन के धनुष का नाम गांडीव था। ये पांचों पांडवों में तीसरे भाई थे।

3#भीष्मपितामह(Bhism pitamaha).

 

Bhismpitamaha

भीष्मपितामह(Bhismpitamaha)- भीष्मपितामह जी को अनेकों नाम से जाना जाता हैं। जैसे- पितामह, देवव्रत, गंगापुत्र। उनके पिता का नाम शांतनु तथा माता का नाम सत्यवती था। और उनकी आयु की बात करे तो जब युद्ध हुआ तो उनकी आयु 160 वर्ष के आस पास थी।महाभारत युद्ध में अभिन्न भूमिका निभाई हैं और महाभारत युद्ध मे कोरावो की ओर से युद्ध किया था।वह एकमात्र ऐसा पात्र था जिसने अपने पिता, कुरु साम्राज्य के राजा शांतनु के शासनकाल से शुरू होकर महाभारत की संपूर्णता को देखा। . भीष्म रिश्ते में कोरावों  और पांडवो के दादा थे। मूल रूप से देवव्रत नाम से, उन्हें अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाया गया था। हालाँकि, उन्होंने अपने पिता की खुशी के लिए अपना सिंहासन सौंप दिया और आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लिया । इस निस्वार्थ निर्णय के कारण, उन्हें भीष्म के रूप में जाना जाने लगा और उनके पिता शांतनु ने उन्हें इच्छा मृत्यु आशीर्वाद दिया। अर्जुन ने बाणों की वर्षा करके भीष्म को बाणों की सिय्या पर लेटा दिया।और उन्होंने पूरा महाभारत युद्ध देखा तथा युद्ध समाप्त होने पर इन्होंने गंगा किनारे इच्छा मृत्यु ली।

4#गुरुद्रोणाचार्य(dronacharya).

द्रोणाचार्य 


गुरु द्रोणाचार्य( dronacharya).-  गुरु द्रोणाचार्य जी के पिता का नाम ऋषि भारद्वाज तथा माता का नाम घृतार्ची था। उनकी माता एक अप्सरा थी। वे पांडवो तथा कोरवों के गुरु थे, कौरवों और पांडवों ने द्रोणाचार्य के आश्रम मे ही अस्त्रों और शस्त्रों की शिक्षा पाई थी। तथा उनका सबसे प्रिय शिष्य अर्जुन था। वे अर्जुन को विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाना चाहते थे।द्रोण अपने पिता के आश्रम में ही रहते हुये चारों वेदों तथा अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में पारंगत हो हो गए। उनके पुत्र का नाम अश्वत्थामा था। महाभारत युद्ध में द्रोण तथा उनके पुत्र अश्वत्थामा  ने पांडवों की ओर से युद्ध किया। महाभारत युद्ध के समय द्रोणाचार्य जी की आयु 140 वर्ष थी। अर्जुन के अलावा उनका एक और शिष्य भी था जिसका नाम एकलव्य था। वह अर्जुन से भी श्रेष्ठ धनुर्धर था। हालाकि द्रोण ने उसकी अस्त्र शस्त्र की शिक्षा नही दी थी पर उसने द्रोण प्रतिमा को अपना गुरु समझकर शिक्षा ग्रहण की। और अर्जन से भी श्रेष्ठ धनुर्धर बना। उसकी ऐसी धनुर्विद्या को देखकर द्रोणाचार्य जी दंग रह गए। और उन्होंने गुरुदक्षना के रूप में एकलव्य के दाएं हाथ का अंगूठा मांग लिया। और एकलव्य ने उन्हें तुरंत अपने हाथ का अंगूठा कटकर द्रोणाचार्य जी के चरणों में रख दिया। (उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि एकलव्य अर्जुन से श्रेष्ठ धनुर्धर न बन जाए।) युद्ध के पंद्रहवे दिन द्रोण द्वारा युद्ध में हो रही पांडव सेना की हानि को देख श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को द्रोण को हराने के लिए भेद का सहारा लेने को कहा और युद्ध में ये बात फैलाने के लिए कहा की अश्वत्थामा युद्ध में मारा गया। परंतु अश्वत्थामा के मान का एक हाथी को मारा गया ।  द्रोण को लगा कि मेरे पुत्र का वध हो गया हैं । और ये सूचना सुनकर वे अंदर से टूट और भूमि पर बैठ गए और अस्त्र शस्त्र त्याग दिए अपने पुत्र की मृत्यु का शौक मानने लगे।तभी पांडव सेना के सेनापति और द्रोपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने तलवार से द्रोण का वध कर दिया।


5#अश्वत्थामा(Ashavthama)

अश्वत्थामा



अश्वत्थामा(Ashavthama)-  अश्वत्थामा अश्वत्थामा पांडवों और कौरवों के गुरु द्रोणाचार्य का बेटा है। और उनकी माता का नाम कृपि था। वह अपने  पिता की तरह वह भी  महान धनुर्धर बना। द्रोणाचार्य और उनकी पत्नी कृपि ने  हिमालय जाकर तमसा  नदी के तट पर शिव की तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया।जन्म के पश्चात् ही इनके कण्ठ से हिनहिनाने की सी ध्वनि हुई जिससे इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा।जन्म से ही अश्वत्थामा के मस्तक में एक अमूल्य मणि विद्यमान थी। जो कि उसे दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता, नाग आदि से निर्भय रखती थी। अश्वथामा ने अपने पिता श्री का बदला लेने के लिए, पांडवो पर आक्रमण का दिया।युद्ध पश्चात अश्वत्थामा ने द्युष्टद्युम्न का वध कर दिया। अश्वत्थामा ने अभिमन्यु पुत्र परीक्षित पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। छुप कर वह पांडवों के शिविर में पहुँचा और घोर कालरात्रि में कृपाचार्य तथा कृतवर्मा की सहायता से पांडवों के शेष वीर महारथियों का वध कर डाला। केवल यही नहीं, उसने पांडवों के निद्रामग्न पांचों पुत्रों के मस्तक भी विच्छेदित कर डाले। अश्वत्थामा के इस पतित कर्म की सभी ने निंदा की, यहाँ तक कि दुर्योधन तक को भी यह अनुचित लगा। तथा अश्वथाम ने पांडवो पर ब्रह्मास्त्र की प्रयोग किया। तथा इसके विपरित अर्जुन ने भी पशुपता अस्त्र का प्रयोग किया था। युद्ध के बाद श्री कृष्ण ने भीम से कहा की अश्वथमा के मस्तक से मणि निकल लो परंतु अश्वथाना ने पहले ही मणि निकाल कर श्री कृष्ण जी को दे दी थी।श्री कृष्ण जी ने अश्वथमा को श्राप दिया की तुम जब तक जीयोगे कोहड़ी का जीवन जीयोगे।अश्वथामा सात चिरंजीवी में से एक हैं।



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